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सिद्धि का मंत्र वैभव मंत्र

लक्ष्मीजी की सिद्धि का मंत्र

वशिष्ठ  महाराज के पास लक्ष्मीजी की सिद्धि का मंत्र था | रावण कों भी वह  मंत्र मिला था | उसीसे रावण कहता है मैंने सोने की लंका बनाई | कुबेर भी लक्ष्मीजी की उपासना से इतना धनपति हो गया | राजा कैकय  के साथ युद्ध में अयोध्या का धन खर्च हो गया था | अयोध्या की आर्थिक स्तिथि कमजोर हो गयी थी | तो दशरथ राजा कों वसिष्टजी ने स्वर्ण उधारी पे दिया था | गुरु के पास इतनी सम्पति थी के राज्य की आर्थिक व्यवस्थामेंगुरुनेलोनदिया |
आज के लोग कहते हैं के गुरु कों क्या आवश्यकता है पैसे की | गुरु के नही होगी तो शैतानों के पास होगी, तो शैतान, शैतानी करेंगें, बम बनाएंगे | गुरु के पास सम्पति होगी तो गिरते हुए समाज कों उठांगे | बड़े-बड़े राजा, जब राजतन्त्र कंगालियत में गिर जाता तो फिर गुरुओ से ले लेते उधारी | ब्याज सहित लौटा देते | ब्याज तो लेते होंगें, नही लेते होंगें ये शास्त्र में उलेख नही आया है | लेकिन राजाओ कों फाइनैंस करते थे, साधू-संत, ऋषि-मुनि | बोले साधू कों क्या पैसे की जरूरत है ? क्या बकते हैं ? भीखमंगे कों साधू बोलोगे क्या ? जो भीख मांगता फिरे | विरक्त की बात अलग है कोई विरक्त होते हैं | लेकिन जो समाज के उधान के कार्य करते हैं उनके लिए तो जमीन भी चाहिए, मकान भी चाहिए, साधकों का निवास भी चाहिए, साधकों के लिए रसोरा भी चाहिए | साधकों के लिए सुरक्षा भी चाहिए |
लक्ष्मी के मंत्र की सिद्धि भी होती है

देवी भागवत में लिखा है ये मंत्र

 श्रीं ह्रीं क्लिम एं  कमल वासिन्येय स्वाहा ||

एक बिज मंत्र बहुत ताकत रखता है तो इसमें बिज मंत्र हैं | तो कुबेर जी ने वैभव पाया तो इसी मंत्र की सिद्धि से | अमावस्या के दिन इस मंत्र की सिद्धि होती है | तो हम ये मंत्र लक्ष्मी प्राप्ति के लिए करते हैं | लक्ष्मीजी कहती हैं जो उद्यमी है, साहसी है, उसके पास मैं रहती हूँ | जो कटु भाषी है, आलसी है, जरा-जरा बात में उलझ जाता है गंदा रहता है, उसके यहाँ में ज्यादा नही टिकती हूँ | और जो नारायण के तरफ जाता है, उसकी तो मैं पौषक हूँ | लेकिन जो भोग-विलास में पड़ता है, उसके पास मैं उल्लू पर आती हूँ | जो सत मार्ग में जाता है उस के यहाँ तो मैं कमल वासनी, गरुड पे आती हूँ | इसलिए लक्ष्मी पूजन करें नारायण पूजन सहित विद्धि-विधान से | तो लक्ष्मी सुखदाई हो जाती है | भागवत प्राप्ति में सहायता देती है | सत कर्म में जो लक्ष्मी लगती है, सतकर्म में जो मन लगता है |